Thursday, 28 April 2016

Pet kharab hai

पेट ख़राब है

गांव का स्वस्थ्य केंद्र खुल गया था, केंद्र पर रोगियों की भीड़ जुट चुकी थी। डॉक्टर कुशवाहा आते ही रोगियों को देखना प्रारम्भ कर दिये। कुछ देर बाद, अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही, एक महिला चंपा का नंबर आ गया। उस समय उसकी सहायता करने हेतु आया, उसका पति शौचालय चला गया था। वह महिला पहले तो डॉक्टर कुशवाहा के कक्ष में जाने में झिझक रही थी, पर, वहां एकत्र लोगों ने उससे कहा कि तुम्हारा नंबर आ गया है, जा के डॉक्टर को दिखा लो, तब वह कक्ष में गयी और डॉक्टर के बगल वाले स्टूल पर बैठ गयी।
'हां, क्या हुआ है?' डॉक्टर ने पूछा।
'डॉक्टर साहब! पेट ख़राब है।' महिला ने उत्तर दिया।
'तकलीफ क्या है ?'
थोड़ा शरमाते, पेट पर हाथ रख के 'पेट ख़राब है। '
'पेट में दर्द है ?' डॉक्टर ने फिर से पूछा।
'नहीं! पेट ख़राब है। ' महिला ने उत्तर दिया।
डॉक्टर कुशवाहा थोड़ा झुंझला कर बोले, ' अरे, पेट ख़राब है, इससे मैं क्या समझूंगा? तकलीफ क्या है, ये तो बताओ, जल्दी से दवाई लिखूं, और भी बहुत मरीज देखने हैं। '
चंपा ने रिकॉर्ड किये टेप की भांति फिर से दोहरा दिया, 'डॉक्टर साहब! पेट ख़राब है। '
डाक्टर कुशवाहा वहां के अनपढ़ लोगों और उनके सीधेपन से परिचित थे। वे इस बात से आवेश में आये बिना चंपा से थोड़ा घुमा फिरा कर पूछना आरम्भ कर दिए, 'पेचिस है? '
चंपा पेचिस नहीं जानती थी, अगर वे आंव बोलते तो शायद वह 'नहीं' बोल देती। फिर वही उत्तर 'पेट ख़राब है। ' लूज मोशन भी उसकी समझ से बाहर था। डॉक्टर कुशवाहा धैर्य खोये बिना, एक एक करके पूछने लगे -
पेट में दर्द है ? 'नाहीं'
टट्टी हो रही है ?  'हाँ '
कड़ी हो रही है ? 'नाहीं'
पतली हो रही है ? 'हाँ'
कितनी पतली ? 'एक्दमै पानी'
कितनी बार गयी ? 'चार-पांच बेर'
उलटी भी हो रही है ? 'नाहीं'
डॉक्टर कुशवाहा, लूज मोशन की दवाई लिख ही रहे थे कि चंपा का पति आ गया - 'डॉक्टर साहब! चंपा का पेट झरत है। '


एस० डी० तिवारी

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