Thursday, 7 April 2016

Ameer kaun

अमीर कौन

सामू का खेत सड़क के किनारे ही था। वह अपने खेत में काम कर रहा था, एक बड़ी सी कार गुजरी। उसके
ही गांव का रघुवीर, वहीं खड़ा था बोला,'देख रहा है सामू! वो जो कार गयी घनश्याम सेठ की थी, वह बहुत बड़ा अमीर है और जनता है यह कार कितनी महँगी है, एक करोड़ से थोड़ा ही कम। इसी सड़क पर फैक्ट्री लगाने के लिए जगह ढूंढ रहा है। '
'होगा, हमें क्या दे देगा। उसका धन है तो उसके लिए।  हमारे पास जो है, हमारे लिए बहुत है।
कबीर दास का दोहा सुना है न -
साधु इतना दीजिये जामे कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाय।
भगवान ने स्वस्थ शरीर दे रखा है, हंसता खेलता परिवार है, प्रकृति की गोद में बिठा रखा है।  दो जून की अपनी मेहनत की रोटी मिल जाती है और क्या धन चाहिये। और तो और किसी को सताना नहीं पड़ता। ये तो बेचारे क्या क्या पापड़ बेलते होंगे। कहां कहां हेरा फेरी करते होंगे, टैक्स का डंडा, धन को संभालने का झंझट। जरा सा छाती में दर्द हुआ, लाखों रुपये डॉक्टर के। हमारी छाती देख, चौड़ी भी है और मजबूत भी। दर्द हुआ तो हाथ पांव हिला लिया और गैस बाहर। वे अपना बोझ भी नहीं उठा सकते, कुली ढूंढना पड़ता है। एक काम अपने आप कर नहीं सकते।' सामू ने पूरा लेक्चर झाड़ दिया। 

'सो तो ठीक है, ये सब करने के लिए उनके पास पैसा भी तो है। हम लोग बीमार होते हैं इतनी तकलीफ सहते हैं, उनके यहाँ फटाफट डॉक्टर आ जाता है, अस्पताल चले जाते हैं। इन्हें आराम कितना है।' रघुवीर बोला।

'हमारे पास पैसे कम है तो बीमारी भी कम हैं। हम बीमारी की तकलीफ सहते हैं, तो क्या वे डॉक्टर को ख़ुशी से पैसे देते हैं? दुनिया भर की जाँच कराने में तकलीफ नहीं होती? वे भी तो सोचते होंगे डॉक्टर को पैसे न देने पड़ें। हम जो यह सब सह लेते हैं, हमारी वो निहित शक्ति क्या धन नहीं है? और बैंक भी अपने साथ, क्योंकि वह सब हमारे शरीर में ही समाये है। '

रघुवीर यह सब सुनकर अवाक् रह गया। थोड़ा सोच कर बोला, 'फिर भी धन का महत्व तो है ही। '

'अरे भाई, वो मैंने पहले ही कह दिया, परिश्रम से आवश्यकता भर धन तो कमा ही सकते हैं।  उतना भी कमा कर क्या करना की गोली खाकर बिस्तर पर सोने जायँ। हमें देख रात को क्या ठाट से नींद आती है।  सुबह सुबह पेड़, पौधे, पशु, पक्षी का साथ होता है। यह सारा क्या धन नहीं है ? वो चार कदम के लिए गाड़ी निकलवाएंगे, हम कोसों पैदल जा सकते हैं। ऐसी के लिए बिजली का खर्च, हमारा पेड़ की छाँव ही ऐसी है। सुना है अमीर लोगों पर कर्ज का भी भारी बोझ होता है। इनके पास हमारा अंश तो हो सकता है, हमारे पास इनका नहीं। '
'अरे नहीं भाई, सामू! शहर में इनका नाम है। '
'कृष्ण द्वारकाधीश थे, सुदामा एक गरीब ब्राह्मण, तो क्या सुदामा का नाम कृष्ण के साथ नहीं चल रहा है? क्या इन सेठ जी का नाम सुदामा से भी बड़ा है? आचरण भी धन है भाई। मैं तो तनावमुक्त सीधी सादी जिंदगी से बढ़कर किसी चीज को धन नहीं मानता। जब तनाव में होते हैं तो धनी लोग, बाबा के यहाँ पैसा बहा कर आते हैं। हम तो भगवान की पूजा भी सच्चे मन से खुद कर लेते हैं। ' 
अब तो रघुवीर की आगे बोलने की क्षमता समाप्त हो गयी थी। बस यही कहकर चुप हो गया, 'अरे सामू! तू कितना धनी है, मैं तो आज जाना।'

एस० डी० तिवारी  

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